विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज

आडंबर से अध्यात्म तक: आज के पूजन-यज्ञ और शास्त्रीय कसौटी

आडंबर से अध्यात्म तक: आज के पूजन-यज्ञ और शास्त्रीय कसौटी आडंबर से अध्यात्म तक: आज के पूजन-यज्ञ और शास्त्रीय कसौटी

“जब धार्मिक कृत्य केवल सामाजिक प्रतिष्ठा, वीआईपी संस्कृति और व्यक्तिगत अहंकार की तुष्टि का साधन बन जाते हैं, तो वे अपनी दिव्यता खो देते हैं।”

​आज के धार्मिक आयोजन केवल सामाजिक प्रतिष्ठा और वीआईपी संस्कृति तक सीमित होकर अपनी दिव्यता खो रहे हैं, जबकि शास्त्रों में निर्मल मन और सात्त्विक भाव को ही सर्वोपरि माना गया है। शास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करना और स्वधर्म के प्रति निष्ठा रखना ही कल्याणकारी है, न कि भारी शोर-शराबा या धन का प्रदर्शन। विधिहीन और अहंकारपूर्ण यज्ञ तामसिक होते हैं।

आडंबर से अध्यात्म तक: आज के पूजन-यज्ञ और शास्त्रीय कसौटी

​क्या हमारे धार्मिक आयोजन सात्त्विक हैं? “सनातन की ओर से” दिखावे से श्रद्धा और मर्यादा की ओर लौटने का एक आत्मीय आह्वान

आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ हमारे चारों ओर धार्मिक आयोजनों की बाढ़ सी आई हुई है। गगनचुंबी पंडाल, मीलों तक फैली चकाचौंध, कानों के पर्दे फाड़ देने वाले डीजे और लाउडस्पीकर, तथा करोड़ों रुपयों का भारी-भरकम बजट—आज किसी भी बड़े यज्ञ, कथा या पूजा की अनिवार्य पहचान बन चुके हैं। किंतु इस बाहरी तड़क-भड़क के बीच, सनातन की ओर से हमें ठहरकर अपने अंतःकरण से एक गंभीर प्रश्न पूछने की आवश्यकता है: क्या इस कोलाहल में हमारे मन की शांति, आत्मा की पवित्रता और शास्त्रों की गरिमामयी मर्यादा कहीं खो तो नहीं गई है?

​सनातन धर्म केवल लकीर के फकीर बनकर क्रियाकांड दोहराने का नाम नहीं है; यह एक परम आध्यात्मिक विज्ञान है जो मनुष्य के चित्त की शुद्धि के लिए प्रकट हुआ था। जब धार्मिक कृत्य केवल सामाजिक प्रतिष्ठा, वीआईपी संस्कृति और व्यक्तिगत अहंकार की तुष्टि का साधन बन जाते हैं, तो वे अपनी दिव्यता खो देते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अनन्य उपासक गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में भगवान का वह शाश्वत स्वभाव प्रकट किया है, जो आज के आधुनिक समाज की आंखें खोलने के लिए पर्याप्त है:

निर्मल मन जन सो मोहि पावा

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥

​ईश्वर को हमारे धन का अहंकार, पंडालों की भव्यता या छल-कपट से भरा दिखावा रत्ती भर भी नहीं सुहाता; उन्हें तो केवल निर्मल और सात्त्विक मन की चाह है। आइए, श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस और मनीषियों के वचनों के आलोक में आज के धार्मिक आयोजनों का शास्त्रीय परिष्करण (Purification) करें।

​1. दिखावे की भेंट चढ़ते यज्ञ: तामसी आयोजन और गीता की चेतावनी

“यज्ञीय अन्न की शुद्धता ही देवताओं की तृप्ति और हमारे अंतःकरण की शुद्धि का कारण बनती है।”

​वर्तमान समय में कई धार्मिक आयोजन बिना किसी शास्त्रीय तैयारी, अशुद्ध उच्चारण और केवल एक ‘इवेंट’ (Event) की तरह औपचारिकता पूरी करने के लिए किए जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय का 13वां श्लोक ऐसे आयोजनों पर सीधा और तीखा प्रहार करता है:

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥

  • शास्त्रीय परिष्करण: भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो यज्ञ ‘विधिहीनम्’ (शास्त्रों के नियमों के विरुद्ध) हो, जिसमें ‘अमसृष्टान्नम्’ (यज्ञ की मर्यादा के अनुरूप शुद्ध अन्न की आहुति न दी गई हो तथा वहाँ उपस्थित आचार्यों, भद्र-पुरुषों और अभ्यागतों के लिए सात्त्विक अन्न-प्रसाद की उचित व्यवस्था न हो), जो ‘मन्त्रहीनम्’ (अशुद्ध और जल्दबाजी में चीखकर बोले गए मंत्रों वाला) हो, जहाँ ‘अदक्षिणम्’ (योग्य आचार्यों का यथोचित सम्मान और पारिश्रमिक न हो), और जो ‘श्रद्धाविरहितं’ (बिना किसी आंतरिक भक्ति के) किया जाए—वह तामस यज्ञ है।
  • सनातन का संदेश: यज्ञीय अन्न की शुद्धता ही देवताओं की तृप्ति और हमारे अंतःकरण की शुद्धि का कारण बनती है। यदि यज्ञ में अन्न और हविष्य की सात्त्विकता तथा मर्यादा का आदर नहीं है, तो वह आयोजन पुण्य देने के बजाय केवल तामसिक अहंकार को बढ़ावा देता है।

​2. वर्णाश्रम मर्यादा और अधिकार-भेद: अपनी प्रकृति से ही परम कल्याण

​आजकल एक और बड़ी विसंगति यह देखने को मिलती है कि यज्ञ और अनुष्ठानों में शास्त्रीय मर्यादाओं, कुल-परंपरा और अपनी आत्मिक स्थिति का ध्यान नहीं रखा जाता। सनातन धर्म का मूल आधार ‘स्वधर्म’ और ‘वर्णाश्रम व्यवस्था’ है। शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि जिस मनुष्य के लिए जो अधिकार और कर्तव्य तय किए गए हैं, उसका कल्याण उसी का निष्ठापूर्वक पालन करने से होगा, किसी दूसरे की होड़ करने से नहीं। श्रीमद्भगवद्गीता (18.47) कहती है:

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्॥

  • अधिकार-भेद और कल्याण का मार्ग: शास्त्रों के अनुसार, वेदों के अध्ययन-अध्यापन और वैदिक यज्ञों के संपादन का अधिकार ‘द्विज’ (त्रैवर्णिक—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) को दिया गया है। उनके जन्म, संस्कार और प्रकृति के अनुसार उनका कल्याण उन्हीं वैदिक कर्मों और मर्यादाओं के पालन से सुनिश्चित होता है। वहीं दूसरी ओर, शूद्र वर्ण के लिए शास्त्रों ने सेवा, समाज के पोषण और पौराणिक व तांत्रिक पद्धतियों से पूजन की अत्यंत सरल एवं श्रेष्ठ मर्यादा बताई है। शूद्रों का परम कल्याण अपनी इसी सहज मर्यादा और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने से होता है।
  • सनातन का संदेश: भगवान के दरबार में कोई छोटा या बड़ा नहीं है, केवल कर्तव्य अलग हैं। यदि कोई वैदिक यज्ञों की सामाजिक होड़ में अपनी शास्त्रीय मर्यादा को छोड़ता है, या अपने गृहस्थ और सामाजिक उत्तरदायित्वों से मुंह मोड़कर केवल नाम कमाने के लिए अनुष्ठान करता है, तो वह कर्म फलहीन हो जाता है।

​3. लोकाचार का अनर्गल प्रलाप बनाम शास्त्राचार

​गोस्वामी तुलसीदास जी ने कलयुग की इस भटकाने वाली प्रवृत्ति का वर्णन रामचरितमानस के उत्तरकांड में पहले ही कर दिया था:

लोकाचार का अनर्गल प्रलाप बनाम शास्त्राचार

श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत विरति विवेक। तेहिं परिहरि हीं पंथ चलिहीं जे नर मति कूर अनेक॥

  • भ्रम का निवारण: वेद-सम्मत, विवेकपूर्ण और सात्त्विक मार्ग को छोड़कर लोग अपनी मनमर्जी के नए-नए रास्ते (पाखंड) बनाकर उन पर चलते हैं। महाभारत के वनपर्व का यह कथन कि “महाजनो येन गतः स पन्थाः”, वहाँ ‘महाजन’ का अर्थ आज की दिशाहीन और चकाचौंध के पीछे भागने वाली ‘भीड़’ या ‘अहंकारी धनी लोग’ नहीं है। वहाँ महाजन का अर्थ ‘ऋषि, मुनि और वे श्रेष्ठ तत्वदर्शी महापुरुष’ हैं जिन्होंने शास्त्रों की मर्यादा के भीतर जीवन जिया।
  • शास्त्र ही अंतिम प्रमाण है: सनातन में बहुसंख्यक भीड़ (लोकाचार) धर्म की कसौटी नहीं है, बल्कि ‘शास्त्राचार’ ही अंतिम सत्य है। श्रीमद्भगवद्गीता (16.24) में स्वयं भगवान कहते हैं: ​तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ (अर्थात: तुम्हारे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही एकमात्र प्रमाण है। शास्त्र के नियमों को जानकर ही तुम्हें कर्म करना चाहिए।)
  • शास्त्रीय परिष्करण: जो यज्ञ केवल ‘दम्भार्थम्’ (अपनी महानता दिखाने या पाखंड के लिए) और किसी फल या मान-प्रतिष्ठा की इच्छा से किया जाता है, वह ‘राजस’ होता है। धर्म में जब तक अहंकार का विसर्जन नहीं होता, तब तक भक्ति का बीजारोपण संभव ही नहीं है।
  • शास्त्रीय संतुलन: सात्त्विक यज्ञ का अर्थ यह नहीं है कि संपन्न व्यक्ति भी बिल्कुल असमर्थों की तरह आयोजन करे या धन छिपाने की चेष्टा करे। अपने वैध सामर्थ्य के अनुसार श्रेष्ठ, शुद्ध सामग्री का उपयोग और प्रचुर मात्रा में अन्न-दान व दक्षिणा देनी चाहिए। अंतर केवल इतना है कि यह खर्च वैभव के प्रदर्शन या अपनी झूठी वाहवाही के लिए नहीं, बल्कि यज्ञ की उच्च गुणवत्ता, मर्यादा और परोपकार के लिए होना चाहिए।
  • सनातन का संदेश: सनातन संस्कृति प्रकृति-पूजक है। जो धर्म वृक्ष, नदी, गाय और चींटी तक में ईश्वर देखता है, वह धर्म कभी भी समाज या पर्यावरण को पीड़ा देकर पूजा करने की अनुमति नहीं दे सकता। लाउडस्पीकर का अमर्यादित शोर भक्ति नहीं, मानसिक विकृति है।
  • सनातन का संदेश: कलयुग में बड़े और जटिल भौतिक यज्ञों में विधिहीनता या तामसी दोष होने की संभावना ९९% रहती है। इसलिए, इस युग में यदि कोई व्यक्ति शांत चित्त से, अपनी मर्यादा में रहकर केवल ‘नाम-जप’ या ‘संकीर्तन यज्ञ’ करता है, तो वह बिना किसी त्रुटि के सीधे परम कल्याण को प्राप्त कर सकता है। यह आज के आधुनिक और व्यस्त समाज के लिए सबसे बड़ा वरदान है।
  • शास्त्रीय परिष्करण: जब तक मनुष्य आडंबरों में फंसा रहता है, वह भेदों में उलझा रहता है। किंतु जब वह सात्त्विक आचरण पर आता है, तब उसे ज्ञात होता है कि ‘भक्ति’, ‘भक्त’, ‘भगवान’ और ‘गुरु’—ये चारों नाम भिन्न हो सकते हैं, पर इनका तत्त्व और स्वरूप (वपु) एक ही है। गुरु के बिना भक्ति नहीं, भक्त के बिना भगवान नहीं, और भगवान के बिना भक्ति का कोई अस्तित्व नहीं। इस अभेद सत्य को पहचानना ही सनातन की वास्तविक उपलब्धि है।
  • मर्यादा और स्वधर्म का पालन करें: अपनी स्थिति, कुल, वर्ण (चाहे द्विज हो या शूद्र) और आश्रम के अनुसार शास्त्र-सम्मत विधि से ही यज्ञ और पूजन का संपादन करें। दूसरों की देखा-देखी या सामाजिक होड़ में अपनी शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन न करें, क्योंकि स्वयं के लिए नियत कर्तव्य ही परम गति देने वाला है।
  • भव्यता पर नहीं, भाव पर ध्यान दें: करोड़ों मंत्रों के कोलाहलपूर्ण जाप से बेहतर है कि शांत मन से कुछ क्षण शुद्ध भाव से भगवान का स्मरण किया जाए। कलयुग के परम साधन ‘जप यज्ञ’ को प्राथमिकता दें।
  • धन का सही विनियोग (सनातनी सेवा): पंडालों, लाइटिंग और स्वागत-सत्कार पर पानी की तरह पैसा बहाने के बजाय, ‘वित्तशाठ्यं न कारयेत्’ के सिद्धांत को समझें। उस धन का उपयोग असहाय गोवंश की सेवा (गौशालाओं के सहयोग), उपेक्षित व जीर्ण-शीर्ण प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार, तथा हमारी विलुप्त होती प्राचीन वैदिक पाठशालाओं (गुरुकुलों) के संरक्षण व सात्त्विक अन्न-दान में लगाएं।
  • अहंता का विसर्जन और समत्व-भाव (शरणागति): भगवान के पंडाल या मंदिर में प्रवेश करते समय अपनी लौकिक जाति, सांसारिक पद और धन के अहंकार को ठीक उसी तरह बाहर छोड़ दें, जैसे हम अपने जूते-चप्पल बाहर छोड़ते हैं। महाभारत के राजसूय यज्ञ में साक्षात् पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण ने स्वेच्छा से ‘अतिथियों के जूठे पत्तल उठाने’ की सेवा चुनी थी। इसी प्रकार, द्वारकाधीश ने निर्धन सुदामा जी को अपने सिंहासन पर बैठाकर अश्रुओं से उनके चरण धोए थे। जब ईश्वर के सम्मुख सांसारिक ऊंच-नीच के सारे मुखौटे स्वतः ही गिर जाते हैं, तो वहाँ वीआईपी व्यवस्था (VVIP संस्कृति) की चाह रखना साक्षात् आध्यात्मिक अपराध है।
  • प्रकृति मित्र (Eco-friendly) बनें: मूर्तियां पारंपरिक मिट्टी की हों, उत्सवों में प्लास्टिक का उपयोग बंद हो, और लाउडस्पीकर की आवाज केवल परिसर के भीतर तक सीमित हो ताकि किसी भी जीव को पीड़ा न हो।

आइए, सनातन के इस शुद्ध, सात्त्विक और वैज्ञानिक स्वरूप को पहचानें। जब हमारे यज्ञों में लोकाचार का भ्रम टूटेगा, शास्त्राचार की स्थापना होगी, मंत्रों में शुद्धता और हृदयों में सच्ची श्रद्धा होगी, तभी हमारा देश और समाज वास्तविक सुख, शांति और समृद्धि की ओर अग्रसर होगा।

जय सनातन, जय श्री कृष्ण!

अस्वीकरण (Disclaimer)

वैचारिक एवं आध्यात्मिक स्पष्टीकरण: यह लेख पूर्णतः सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों (श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस, महाभारत, मनुस्मृति एवं भक्तमाल आदि) की मूल शिक्षाओं, शास्त्रीय मर्यादाओं और आध्यात्मिक सिद्धांतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, संस्था, संप्रदाय, जाति या सामाजिक वर्ग की भावनाओं को आहत करना, नीचा दिखाना अथवा उनकी धार्मिक श्रद्धा को ठेस पहुँचाना कदापि नहीं है।

सामाजिक एवं कानूनी संदर्भ: यह लेख किसी भी प्रकार के राजनीतिक, आधुनिक सामाजिक सुधार (Social Reform) अथवा समकालीन विमर्श के नारों से प्रेरित नहीं है, बल्कि विशुद्ध रूप से शास्त्रों में वर्णित ‘अधिकार-भेद’, ‘स्वधर्म’ और ‘यज्ञीय शुद्धता’ के आध्यात्मिक विज्ञान को प्रकट करता है। लेख में उल्लिखित ‘समानता’ का दृष्टिकोण पूर्णतः वेदांत और भक्ति-शास्त्र की ‘अभेदात्मक शरणागति’ (ईश्वर के सम्मुख अहंता का विसर्जन) पर आधारित है, इसे किसी लौकिक या कानूनी अधिकार के संदर्भ में न देखा जाए।

  • यहाँ दिए गए सुझाव (जैसे—गौ-सेवा, जीर्ण-शीर्ण मंदिरों का पुनरुद्धार और गुरुकुलों का संरक्षण) सनातन परंपरा के अनुसार धन के सात्त्विक विनियोग का शास्त्रीय मार्गदर्शन मात्र हैं।
  • यह लेख केवल पाठकों के आध्यात्मिक परिष्करण, चित्त शुद्धि और उन्हें सनातन संस्कृति के मूल सात्त्विक एवं मर्यादित स्वरूप के प्रति जागरूक करने के ध्येय से प्रस्तुत किया गया है।
शंका से समाधान : दृष्टिकोण बदलो, दृश्य स्वतः बदल जाएंगे
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शंका समाधान: क्या सनातन धर्म प्रगति, आधुनिकता और विज्ञान का विरोधी है?

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