विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज

“दीक्षा-भेदेऽपि गृह-एकता: एकादशी एवं जन्माष्टम्यादि व्रतों में संप्रदाय-द्वंद्व का शास्त्रीय समाधान”

"दीक्षा-भेदेऽपि गृह-एकता: एकादशी एवं जन्माष्टम्यादि व्रतों में संप्रदाय-द्वंद्व का शास्त्रीय समाधान" "दीक्षा-भेदेऽपि गृह-एकता: एकादशी एवं जन्माष्टम्यादि व्रतों में संप्रदाय-द्वंद्व का शास्त्रीय समाधान"

पं. गंगाधर पाठक मैथिल के माध्यम से संप्राप्त अजयमेरु-मयराष्ट्र के प्रबुद्ध गृहस्थों की जिज्ञासा पर एक धर्मशास्त्रीय विमर्श

अजयमेरु (अजमेर) एवं मयराष्ट्र (मेरठ) के शांकरपरम्परा-निष्ठ प्रबुद्ध गृहस्थों की धर्मशास्त्रीय समस्या का प्रामाणिक समाधान

पीठिका: समस्या का उद्गम और प्राकट्य

सनातन धर्म की शास्त्रीय परंपरा में शंकाओं का समाधान और गंभीर विमर्श सदैव विद्वानों के माध्यम से ही प्रवाहित होता आया है। अजयमेरु और मयराष्ट्र के दो संभ्रांत एवं विद्वान् गृहस्थों के सम्मुख उपस्थित यह धर्मशास्त्रीय संकट सीधे मेरे पास नहीं आया, अपितु इसका प्राकट्य एक विशिष्ट विप्र-परंपरा के माध्यम से हुआ है। इन दोनों गृहस्थों ने अपनी इस गंभीर पारिवारिक जिज्ञासा को सर्वप्रथम मूर्धन्य विद्वान् पंडित श्री गंगाधर पाठक मैथिल जी के सम्मुख निवेदित किया। तत्पश्चात्, पंडित जी के माध्यम से यह समस्या परिष्कृत रूप में मुझ तक संप्राप्त हुई है।

इस प्रकार, मैथिल विद्वत्परंपरा की गरिमा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न प्रामाणिक ग्रंथों, संप्रदायों के नियमों तथा धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों के आलोक में इस समस्या का अकाट्य एवं परिष्कृत समाधान यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

भूमिका: आधुनिक कुटुंब और संप्रदाय-भेद का संकट

एक ही छत के नीचे विभिन्न उपासना-पद्धतियों और संप्रदायों के प्रति निष्ठा रखने वाले सदस्य निवास करना सनातन धर्म की उदारता का प्रत्यक्ष उदाहरण है। किंतु यह विविधता कभी-कभी व्रत, पर्व और तिथियों के निर्णय में एक गंभीर व्यावहारिक संकट को जन्म दे देती है। प्रस्तुत समस्या में दोनों गृहस्वामी स्वयं शांकर (स्मार्त) परम्परा में दीक्षित हैं, उनके आत्मज (पुत्र) श्रीरामानन्दपरम्परा में और बहुएँ निम्बार्क एवं गौड़ीय सम्प्रदाय से अनुप्राणित हैं। ऐसी स्थिति में एकादशी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी जैसे महाव्रतों के संपादन में तिथियों का मतभेद अपरिहार्य हो जाता है, क्योंकि:

आधुनिक कुटुंब और संप्रदाय-भेद का संकट
आधुनिक कुटुंब और संप्रदाय-भेद का संकट
  • स्मार्त जन सामान्यतः सूर्योदयवेध (अरुणोदय काल के बाद की दशमी) का विचार सूक्ष्मता से नहीं करते और अर्धरात्रि-व्यापिनी तिथि को प्रधानता देते हैं।
  • रामानन्दपरम्परा में अरुणोदयवेध (सूर्योदय से ४ घटी पूर्व दशमी का लेश) होने पर एकादशी सर्वथा वर्जित है।
  • निम्बार्क और गौड़ीय सम्प्रदाय में ‘कपालवेध’ (सूर्योदय काल में त्रुटि/पल मात्र भी दशमी का संसर्ग) होने पर व्रत का पूर्ण निषेध है।

इस ‘वेध-संकट’ के रहते, क्या एक ही गृह में पृथक-पृथक व्रत किए जाएँ या एक ही? यदि एक ही व्रत हो, तो वह किस शास्त्रीय आधार पर हो? पंडित गंगाधर पाठक जी के माध्यम से आई इस समस्या पर विभिन्न प्रामाणिक ग्रंथों का निर्णय निम्नलिखित है।

१. गृहस्थ जीवन में ‘एकवाक्यता’ और कुलधर्म की रक्षा

धर्मशास्त्रों का अकाट्य सिद्धांत है कि गृहस्थ जीवन में ‘एकवाक्यता’ (वैचारिक और क्रियात्मक एकता) तथा गृहशुद्धि सर्वोपरि है। एक ही घर में दो अलग-अलग दिनों पर एकादशी या जन्माष्टमी मनाने से रसोई व्यवस्था खंडित होती है, अन्न का दोष उत्पन्न होता है और मानसिक वैमनस्य की स्थिति बनती है। ‘निर्णयसिंधु’ (प्रथम परिच्छेद) में स्पष्ट निर्देश है:

“यस्मिन् कुले य आचारो पारंपरिकः क्रमात्। स एव आचरणीयः स्यात् कुलधर्माद्रिहा परः॥”

परंतु जहाँ संतानें और बहुएँ विशिष्ट वैष्णव दीक्षा से बंधे हों, वहाँ कुल के मुखिया (स्मार्त पिता) का यह शास्त्रीय उत्तरदायित्व हो जाता है कि वे ऐसा मार्ग चुनें जिससे किसी का नियम खंडित न हो और शास्त्र की आज्ञा भी सुरक्षित रहे।

२. ‘सर्वसम्मत तिथि’ का शास्त्रीय महासिद्धांत

इस प्रकार के संप्रदाय-संकट और तिथियों के द्वंद्व का निवारण करने के लिए शास्त्रों ने एक परम कल्याणकारी सूत्र दिया है, जो सभी संप्रदायों के मध्य सेतु का कार्य करता है:

“सर्वधर्मेषु मध्यस्था सर्वशास्त्रार्थदर्शिनी। लोकानुग्रहकर्त्री च सा तिथिः सर्वसम्मता॥”

अर्थात, वह तिथि जो सभी धर्मों/सम्प्रदायों के मध्य सामंजस्य (मध्यस्थता) स्थापित करने वाली हो, सभी शास्त्रों के गूढ़ और वास्तविक अर्थ को प्रकट करने वाली हो, और संपूर्ण लोक (परिवार) का कल्याण करने वाली हो—वही तिथि ‘सर्वसम्मत’ होकर ग्राह्य होती है। इस कसौटी पर यदि हम विचार करें, तो वैष्णव पंचांग द्वारा स्वीकृत ‘शुद्ध महाद्वादशी’ या ‘उत्तरविद्धा एकादशी’ ही एकमात्र सर्वसम्मत तिथि सिद्ध होती है।

३. वैष्णव तिथि स्वीकार करने में स्मार्त को दोष नहीं: शास्त्रीय प्रमाण

पिता शांकरपरम्परा (स्मार्त) के हैं। स्मार्त मत की यह विशेषता है कि वह अत्यंत उदार है। स्मार्त पंचांग में ‘पूर्वविद्धा’ (दशमी-युक्ता) और ‘उत्तरविद्धा’ (द्वादशी-युक्ता) दोनों को स्थान है। यदि कोई स्मार्त पुरुष वैष्णव एकादशी (दूजी एकादशी) के दिन व्रत रखता है, तो उसे शास्त्र सम्मत पुण्य ही मिलता है, कोई दोष नहीं लगता। ‘धर्मसिंधु’ (तृतीय परिच्छेद) का अकाट्य वचन है:

“स्मार्तानां तु पूर्वविद्धा उत्तरविद्धा च द्वयमपि ग्राह्यम्, तत्र वैष्णवदिने उपवासे न कश्चित् दोषः।”

इसी प्रकार ‘स्कन्द पुराण’ में भगवान शिव स्वयं नारद जी से कहते हैं:

“मद्वाक्याद् वैष्णवं धर्मम् आश्रित्य व्रतमुत्तमम्। कार्तिकेय! प्रकुर्वीत यतीनां च गृहमेधिनाम्॥”

अर्थात, वैष्णव तिथि का आश्रय लेकर किया गया उत्तम व्रत गृहस्थों और यतियों दोनों के लिए कल्याणकारी है। अतः स्मार्त पिता यदि अपने पुत्र-पुत्रवधुओं के संप्रदाय की रक्षा हेतु वैष्णव तिथि पर व्रत करते हैं, तो उनकी शांकर निष्ठा कहीं से भी खंडित नहीं होती।

४. वैष्णवों के लिए दशमी-वेध का घोर निषेध और अनिष्ट की आशंका

इसके विपरीत, जो पुत्र और बहुएँ रामानन्द, निम्बार्क या गौड़ीय सम्प्रदाय में दीक्षित हैं, वे स्मार्त तिथि (यदि वह दशमी से किंचित भी विद्ध है) पर चाहकर भी व्रत नहीं कर सकते। वैष्णव शास्त्रों में दशमी-संसर्ग वाली एकादशी को ‘आसुरी’ या ‘गांधारी व्रत’ कहा गया है। ‘हरिभक्तिविलास’ (द्वादश विलास) में सनत्कुमार संहिता का सूत्र है:

“कपालवेधो गांगेय! दशम्यैकादशी यदि। न कर्त्तव्या तथा विष्णोः प्रीतिकामैः कदाचन॥”

ब्रह्मवैवर्त पुराण’ तो यहाँ तक चेतावनी देता है:

“दशमी-मिश्रिता या तु गान्धारी-व्रतमुच्यते। न कुर्यात् वैष्णवो विद्वान् पुत्र-पौत्र-क्षयावहम्॥”

५. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत का परिष्कृत निर्णय

जन्माष्टमी के संदर्भ में भी स्मार्त जन अर्धरात्रि में अष्टमी तिथि का योग (चाहे वह सप्तमी-विद्धा ही क्यों न हो) स्वीकार कर लेते हैं। परंतु वैष्णव जन उदयव्यापिनी और नवमी-युक्ता शुद्धा अष्टमी को ही ग्रहण करते हैं। ‘भविष्य पुराण’ का निर्देश है:

“सप्तमी-संयुता अष्टमी न कर्त्तव्या कदाचन। पुत्र-पौत्र-प्रणाशाय तस्मात् तां विवर्जयेत्॥
शुद्धा मेवोपवास्या स्यात् नवमी-संयुता विभो।”

स्मार्त मत के सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ ‘निर्णयसिंधु’ में भी यह स्वीकार किया गया है कि यदि अष्टमी सप्तमी से विद्ध हो, तो स्मार्तों के लिए भी ‘जयंती व्रत’ (जो प्रायः अगले दिन नवमी-युक्ता होती है) करना सर्वथा फलदायी है। अतः जन्माष्टमी का उत्सव भी पूरे परिवार को वैष्णव तिथि के अनुसार ही मनाना चाहिए।

निष्कर्ष एवं धर्मशास्त्रीय महाशंखध्वनि

पंडित गंगाधर पाठक मैथिल जी के माध्यम से आई अजयमेरु और मयराष्ट्र के इन विद्वान गृहस्थों की इस समस्या का अंतिम और परिष्कृत समाधान यही है कि: “दीक्षाभेदेऽपि गेहस्यैकता धर्मो सनातनी।”

निष्कर्ष एवं धर्मशास्त्रीय महाशंखध्वनि
निष्कर्ष एवं धर्मशास्त्रीय महाशंखध्वनि

सम्प्रदाय और दीक्षा की भिन्नता अंतःकरण की शुद्धि के लिए है, परिवार को विखंडित करने के लिए नहीं। शास्त्रों के सूक्ष्म मन्थन और “सर्वधर्मेषु मध्यस्था…” के परम कल्याणकारी सिद्धांत के आलोक में, पूरे परिवार को एक मत होकर वैष्णव पंचांग (निम्बार्क/रामानन्द/गौड़ीय द्वारा मान्य तिथि) के अनुसार ही एकादशी एवं जन्माष्टमी आदि व्रतों का अनुष्ठान करना चाहिए। यही मार्ग स्मार्त पिता की उदारता, पुत्र-पुत्रवधुओं की दीक्षा की मर्यादा और संपूर्ण गृहस्थी के ऐश्वर्य व सौहार्द की रक्षा करने वाला एकमात्र सर्वोत्तम,शास्त्रीय और लोक-कल्याणकारी मार्ग है।

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