विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज

शंका से समाधान : दृष्टिकोण बदलो, दृश्य स्वतः बदल जाएंगे

शंका से समाधान : दृष्टिकोण बदलो, दृश्य स्वतः बदल जाएंगे शंका से समाधान : दृष्टिकोण बदलो, दृश्य स्वतः बदल जाएंगे

“बदलाव की शुरुआत हमेशा भीतर से होगी, बाहर की दुनिया तो बस हमारे भीतर का प्रतिबिंब है।”

जब तक मनुष्य का मन संशयात्मा रहेगा, तब तक वह सत्य को उसके वास्तविक स्वरूप में नहीं देख पाएगा। आज का आधुनिक मनुष्य भी कदम-कदम पर इसी कुरुक्षेत्र का सामना कर रहा है। यह आलेख इसी बात का प्रामाणिक और दार्शनिक विश्लेषण करता है कि कैसे भगवान श्रीकृष्ण और गोस्वामी तुलसीदास जी के शाश्वत विचार हमें अपनी दृष्टि को शुद्ध कर जीवन के हर संकट पर विजय पाना सिखाते हैं।

शंका से समाधान : दृष्टिकोण बदलो, दृश्य स्वतः बदल जाएंगे


१. कुरुक्षेत्र का यथार्थ: समस्या परिस्थिति नहीं, दृष्टि है : जीवन का सबसे बड़ा युद्ध मैदान बाहर नहीं, हमारे भीतर होता है। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन के हाथ से गांडीव धनुष सरकने लगा और पैर कांपने लगे, तो संकट उनकी बाहरी दुनिया में नहीं, उनके भीतर था। उनके मन में उपजी ‘शंका’ और ‘मोह’ ने उनकी दृष्टि पर एक धुंधली पट्टी बांध दी थी, जिससे उन्हें उस धर्मयुद्ध में केवल विनाश और दुख का ही ‘दृश्य’ दिखाई दे रहा था।

युद्ध मैदान बाहर नहीं, हमारे भीतर होता है

सनातन चिंतन यहीं से शुरू होता है। जब तक मन में संशय रहेगा, तब तक हम सत्य को वैसा नहीं देख पाएंगे जैसा वह है। इसीलिए गीता कहती है:

संशयात्मा विनश्यति (श्रीमद्भगवद्गीता ४.४०)
अर्थ: संशय से घिरा हुआ व्यक्ति कभी सुख या स्पष्टता नहीं पा सकता; संशय मनुष्य की निर्णय क्षमता और दृष्टि दोनों को नष्ट कर देता है।

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस सत्य को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रकट किया है:

जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
देखहिं रूप महा रनधीरा, मनहुँ बीर रस धरें सरीरा॥

अर्थ: जिसकी जैसी भावना या दृष्टिकोण होता है, उसे सामने का दृश्य और ईश्वर भी उसी रूप में दिखाई देते हैं। कुरुक्षेत्र की रणभूमि वही थी, पर दुर्योधन को उसमें अपनी सत्ता और अर्जुन को अपनी पराजय दिख रही थी क्योंकि दोनों का दृष्टिकोण अलग था।

२. यथा दृष्टि तथा सृष्टि: सनातन का शाश्वत सत्य : भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की शंकाओं को दबाया नहीं, बल्कि संवाद के माध्यम से उनका समाधान किया। गौर करने वाली बात यह है कि पूरे संवाद के दौरान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र का मैदान नहीं बदला, न ही भीष्म और द्रोण को वहां से हटाया। जो जैसा था, वहीं खड़ा रहा। कृष्ण ने केवल अर्जुन के सोचने का तरीका बदल दिया।

यथा दृष्टि तथा सृष्टि

सनातन का यह शाश्वत नियम है—”यथा दृष्टि तथा सृष्टि”। संसार वैसा नहीं है जैसा वह है, बल्कि संसार वैसा है जैसे हम उसे देखते हैं। जब मनुष्य का दृष्टिकोण नकारात्मक या शंकालु हो जाता है, तो उसे हर जगह केवल कमियां और संकट ही दिखाई देते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं:

पर दोष लखइ जो पर कइ आंखी। ताहि न सुगति कहहिं मुनि साखी॥

अर्थ: जो व्यक्ति अपनी दृष्टि को केवल दूसरों के दोष या परिस्थितियों की कमियां देखने में लगाता है, उसका कल्याण नहीं हो सकता। शंका का समाधान बाहर नहीं, अपनी दृष्टि को शुद्ध करने में है।

जैसे ही अर्जुन की दृष्टि ‘मोह और स्वार्थ’ से मुक्त होकर ‘कर्तव्य और साक्षी भाव’ पर टिकी, उनके सामने का दृश्य स्वतः बदल गया।

३. आधुनिक ‘पार्थ’ का संकट और “सनातन की ओर” कदम : आज के युग में हर वह व्यक्ति ‘पार्थ’ है जो अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के कुरुक्षेत्र में खड़ा है। आज के युवाओं के सामने करियर की अनिश्चितता, असफल होने का डर और मानसिक तनाव (Stress) का संकट है। आज का युवा सोशल मीडिया की चमक-दमक के ‘दृश्य’ देखकर अपनी ‘दृष्टि’ खराब कर रहा है और अवसाद में घिर रहा है।

यहीं पर हमें “सनातन की ओर” मुड़ने की आवश्यकता है। सनातन की ओर लौटने का अर्थ किसी रूढ़िवादी अतीत की ओर लौटना नहीं है, बल्कि उस शाश्वत ज्ञान की ओर कदम बढ़ाना है जो हमें भीतर से मजबूत बनाता है। सनातन हमें सिखाता है कि तनाव कर्म करने से नहीं आता, तनाव परिणाम की शंका से आता है।
तुलसीदास जी का यह प्रसिद्ध दोहा हमें सनातन के इसी निष्काम कर्म के दृष्टिकोण की याद दिलाता है:

कर्म प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥

अर्थ: इस संसार को विधाता ने कर्म प्रधान बनाया है। दृष्टिकोण को परिणाम की शंका से हटाकर केवल श्रेष्ठ कर्म पर केंद्रित कर देना ही सनातन मार्ग है। जब यह समझ आ जाता है, तो असफलता भी अंत नहीं, बल्कि सीखने का एक पड़ाव दिखने लगती है।

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मी गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥

(श्रीमद्भगवद्गीता १८.७३)

अर्थ: हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे आत्मज्ञान प्राप्त हो गया है। अब मैं ‘गतसन्देहः’ (सभी शंकाओं से मुक्त) होकर स्थिर हूँ और अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ूँगा।

गतसन्देहः

यह ‘गतसन्देहः’ (Doubtless) हो जाना ही शंका से समाधान की यात्रा है और यही सनातन का मूल लक्ष्य है। जैसे ही अर्जुन के मन की दुविधा समाप्त हुई, उनका दृष्टिकोण बदल गया और दृश्य स्वतः बदल गए। गांडीव फिर से उठ गया और विजय निश्चित हो गई।

लेख का निचोड़:

“तनाव अधिक काम करने से नहीं आता, तनाव परिणाम की शंका और कर्म से विमुख होने से आता है।”

“सनातन की ओर” हमारी यह यात्रा हमें यही सिखाती है कि परिस्थितियों को बदलने की व्यर्थ कोशिश छोड़ने की आवश्यकता है। बदलाव की शुरुआत हमेशा भीतर से होगी। जैसे ही हमारे विचारों और नजरिए में सनातन सत्य का प्रवेश होगा, बाहर का दृश्य स्वतः ही सुंदर और स्पष्ट हो जाएगा। दृष्टिकोण बदलो पार्थ, दृश्य स्वतः बदल जाएंगे!

अस्वीकरण (disclaimer)

व्यावहारिक दृष्टिकोण: लेख में दिए गए जीवन-प्रबंधन और तनाव-मुक्ति के सूत्र आध्यात्मिक एवं दार्शनिक समझ विकसित करने के लिए हैं। इन्हें किसी भी प्रकार की चिकित्सीय (Psychiatric or Medical) सलाह या पेशेवर करियर काउंसलिंग का विकल्प न माना जाए। मानसिक अवसाद या गंभीर तनाव की स्थिति में संबंधित विशेषज्ञों से परामर्श अवश्य लें।

पूर्व आलेख : शंका समाधान: क्या सनातन धर्म प्रगति, आधुनिकता और विज्ञान का विरोधी है?

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